ज़हर

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दोपहर के 3 बज रहे थे।फ़ोन बजा। उज्ज्वल की आँखों में नींद नहीं थी । वो तो आज भी उस दिन के बारे में ही सोच रहा था जब उसने सृष्टि को आखिरी बार देखा था। बेहद नफरत से उसने फ़ोन उठाया और देखा तो उस हरामज़ादे गिरीश का फ़ोन था। इतना कुछ हो जाने के बाद भी इस आदमी में इतनी हिम्मत है, बस इतना सोचकर खून ज़हर की तरह उसके शरीर में बहने लगा। सृष्टि ने उससे कितनी बार कहा था..कितनी बार समझाने की कोशिश की, पर उसकी आँखों पर तो जैसे पर्दा पड़ा था। उसके प्यारे गिरीश दादा तो आदर्श थे! जब ज़िन्दगी ने उसे अँधेरे की तरफ ठोकर मारी तो एक गिरीश दादा ही तो थे जिन्होंने उसे रास्ता दिखाया, आदमी बनाया, काम सिखाया और इतना बड़ा रंगकर्मी बनाया। भला वो कैसे..? अगर उस दिन उसने सृष्टि की बात सुन ली होती तो आज शायद ये हालत नहीं होती… खुदपर काबू पाने की कोशिश करते हुए उसने फ़ोन उठाया तो गिरीश की लाड़ भरी चिकनी चुपड़ी आवाज़ आयी, “उज्जू कहा रह गया बे? जल्दी सभाग्रह आजा बेट्टा। तू नहीं आया तो मैं मरूँगा कैसे? हीरो साहब जल्दी आजाओ।” इतना कहक़र ठहाका लगाकर फ़ोन काट दिया। उज्ज्वल ने दाँत भींचे और फटाफट नहाने चला गया।

सभाग्रह पहुँचा तो देखा कि सेट लगभग लग चुका है। ये कोई पहली बार नहीं था जब बिना डायरेक्टर के सेट लग गया था। साक्षी के जाने के बाद से तो सबको उसके इस रवैय्ये की आदत हो गयी थी। तभी पीछे से गिरीश की आवाज़ आयी। “कहा रह गया था उज्जू? मेरा ज़हर लाया या नहीं? वरना मैं मरूँगा कैसे?ले साँस ले ले।” सिगरेट बढ़ाते हुए गिरीश बोला। “ले आया गुरु, सब ले आया। आज तो तुम्हें मरना ही होगा।” उज्ज्वल ने मुस्कुराकर कश लेते हुए जवाब दिया।
आखिरी सीन शुरू होने ही वाला था। गिरीश और उज्ज्वल ब्लाइंड्स के पीछे खड़े थे। गिरीश फुसफुसाया ” उज्जू ज़हर देने के बाद थोड़ा प्रोम्प्ट कर देना, खाँसने के बाद के डायलाग ठीक से याद नहीं मुझे।” सीन शुरू हुआ। कहानी के अनुसार उज्ज्वल को लालच में आकर प्रॉपर्टी के कागज़ों पर अपने पिताजी गिरीश के साइन करवाने के बाद उन्हें ज़हर देना था। सीन के आखिर में उज्ज्वल ने गिरीश का मुँह ज़बरदस्ती खोलकर जेब से शहद की बोतल निकालकर उसके मुँह में उड़ेल दी। गिरीश छटपटाने का नाटक करने लगा और फिर फुसफुसाया “उज्जू प्रांप्ट कर-प्रांप्ट कर उज्जू”। एक जोरदार ठसके के साथ उसके मुँह से खून का एक फव्वारा बाहर निकला। एक पल की हैरानी…फिर उज्ज्वल की शक्ल देखकर गिरीश के चेहरे पर दहशत के भाव आ गए। फिर घबराकर चिल्लाया “उज्जू प्रांप्ट कर डायलाग याद नहीं आ रहा।” “एक लौंडिया के पीछे बड़े भाई को आँख दिखा रहा है। अरे ये भी छोड़ देती तुझको पिछलीवाली की तरह। क्या हो गया जो मैंने थोड़ा मज़ा कर लिया और वो ही भाव दे रही थी मुझे। जब मैंने भाव ले लिया तो छत से कूद गई साली। अरे! तेरा भाई लाइन लगा देगा तेरा लिए छोकरियों की। तू अपना ध्यान केवल रंगमंच में लगा। समाज बदलने का ज़िम्मा है हम पर।” उज्जवल ज़हर बुझी आवाज़ में फुसफुसाया। उसकी आँखों से अंगारे निकल रहे थे।इस बीच हॉल में हड़बड़ी और भागादौड़ी का माहौल मच चुका था।” उज्जू…तत तू…” खून के एक और फव्वारे के साथ गिरीश चित्त हो गया।

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