सीख

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वो दिन बाकी दिनों से अलग था। हर दिन की शुरुआत इतनी बुरी नहीं होती। सुबह उठते ही मम्मी से घर के काम को लेकर झगड़ा हो गया। उनके अनुसार घर का काम करना लड़कियों का परम धर्म है। पढ़ाई का क्या है, वो तो जैसे-तैसे करके हो ही जाएगी। मेरा फेमिनिज़्म- शेमिनिज़्म उन्हें फैशन लगता है। खैर, जैसे-तैसे चिड़चिड़ाती हुई कॉलेज पहुँची तो याद आया जिस असाइनमेंट के सबमिशन की आज आखिरी तारीख़ थी, वो तो लड़ाई के चक्कर में घर पर ही भूल आई। क्लास में मैडम ने तबियत से लताड़ा तो आँख में आँसू आ गए। सभी क्लासेज खत्म होने तक मूड बुरी तरह ऑफ हो गया था। उदास मन से बस स्टॉप पर पहुँची ही थी कि बस आ गई। सीट मिलने की जल्दबाज़ी में हड़बड़ाकर बस में चढ़ी तो देखा कि कोई सीट खाली नहीं थी। मैं खीजकर पीछे जाकर खड़ी हो गई। अगले स्टॉप से स्कूल यूनिफार्म पहने दो 14- 15 साल की बच्चियाँ चढ़ी। उन्हें देखकर साफ समझ में आ रहा था कि उन्हें ज़िन्दगी का भरपूर मज़ा आ रहा है। उनके चेहरो से खुशी टपक रही थी। वो एक दूसरे को इशारे करके न जाने किस बात पर ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी। उन्हें इस तरह हँसता देखकर मुझे न जाने क्यों चिढ़ हो रही थी। खैर, मेरा स्टॉप आने वाला था इसलिए मैं आगे बढ़ी और उन्हें एक तरफ हट जाते को कहा। मेरी तरफ उनकी पीठें थी। न तो वो दोनों छोकरियाँ हटी और न उन्होंने कोई प्रतिक्रिया दी। स्टॉप करीब आ रहा था.. मैंने एक बार फिर थोड़ी ऊँची आवाज़ में उन्हें एक तरफ हट जाने को कहा। उनके कान पर फिर भी जूँ नही रेंगी। मेरा पारा चढ़ गया। स्टॉप बस आने ही वाला था…मैंने उन्हें हल्का सा धक्का देकर एक तरफ हटाया और आगे निकलने के बाद गुस्से से पलटकर कानो की तरफ इशारा करके पूछा,” बहरी हो दोनों? सुनाई नहीं देता?” उनके चेहरे पर एक अजीब सा भाव था… कुछ कुछ आत्मदया जैसा। उन्होंने कानों की तरफ इशारा करते हुए इनकार में सिर हिला दिया। मैं स्तब्ध थी…स्टॉप आ गया था। कन्डक्टर ने मुझे डाँटकर बस से जल्दी उतरने को कहा। मैं उतरी और पलटकर उन बच्चियों की तरफ़ देखा। मैंने भी कान पकड़कर माफ़ी माँगने का इशारा किया। ये एक पल में हो गया। बस चल पड़ी पर उससे ठीक पहले बच्चियाँ मुझे देखकर मुस्कुरा दी।
कुछ लोग सबकुछ पाकर भी दुखी रहते हैं और कुछ लोग सब कुछ खोकर भी खिलखिलाने की वजहें ढूँढ़ लेते हैं। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि खुशियाँ तो हमेशा दस्तक देती हैं, बस हमें उनका स्वागत करना पड़ता है।

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