महिला दिवस पर सभी महिलाओं के लिए एक चिट्ठी।

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उन सभी महिलाओं के लिए जो जिन्होंने इस दुनिया को रहने लायक बनाया है –

कल रात फेसबुक से पता चला कि आज महिला दिवस है। वैसे मुझे ये सारे दिवस सब बिना काम के लगते हैं लेकिन कोई आपत्ति भी नहीं है। इसी बहाने साल में एक दिन दिल खोल के तुमको बता तो सकते हैं अपनी बातें। तो सबसे पहले तो सारे मर्दों की ओर से यही कहना था कि शुक्रिया। हमको इस दुनिया में ना सिर्फ लाने के लिए, बल्कि दुनिया में आने के भी नौ महीने पहले से लेकर आखिरी दिन तक हर जगह हमारा साथ देने को। अव्वल तो माँ के रूप में, और उसके बाद भी अलग अलग तरह से, अलग अलग परिस्थितियों में।

फिर भी मुझे एक शिकायत है। तुम खुद को क्यूँ भूल जाती हो ? क्यूँ तुम भूल जाती हो कि इन सारे रिश्तों के अलावा तुम एक महिला भी हो, सिर्फ एक महिला। सिर्फ एक महिला, जिसको पढ़ाई के लिए लड़ना चाहिए, जिसको अपने प्यार के लिए लड़ना चाहिए, जिसको बिना मर्जी के हो रही अपनी शादी के लिए लड़ना चाहिए। तुम सृष्टि हो, तुमको सृष्टि होने के लिए लड़ना चाहिए।

इस भूल में मत रहो कि तुम्हारी लड़ाई की शुरुआत कोई और करेगा। इस भूल में मत रहो कि तुम्हारे लिए कोई फरिश्ता आसमान से आएगा। पुरुष तो क्यूँ ही आएगा ? इतनी आज्ञाकारी हो तुम आखिर; पुरुष क्यूँ चाहेगा कि मेहमानों के सामने चाय की ट्रे किचन से उसको खुद लानी पड़े। जो तुम ये सोच के बैठी हो, तो सुनो, बैठी ही रहो।

ये सोच के बैठी हो तो भूल जाओ फिर पढ़ाई-वढ़ाई के बारे में, अकेले कमरे में बैठ के मत रोना फिर कि शादी जल्दी क्यूँ हो रही है। जो बेटी को पढ़ने से रोका जाए तो माँ बन के तुमको ही बोलना है कि जाने दो उसको। तुमको ही तो बोलना है कि घर की इज्जत तुमको घर में रखने से ‘शायद’ बच जाए, लेकिन तुमको बाहर निकलने देने से ये इज्जत कई गुना बढ़ेगी भी। ये तुमको ही तो बताना है कि ये सृष्टि जब पुरुषों को पैदा कर के तुम्हारे ऊपर रेंगने दे सकती है, तो तुमको कम से कम पुरुषों से डरने की जरूरत तो नहीं ही है।

महिला सशक्तिकरण

 

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हमको पता है कि तुम क्या कर सकती हो। हमको पता है कि तुमको खुला आसमान देने पर तुम कल्पना चावला और अवनी चतुर्वेदी बन सकती हो। हमको पता है कि तुमको घास-मिट्टी का मैदान दिखा दिया जाए तो तुम झुलन गोस्वामी बन सकती हो। हमको पता है कि तुमको कहीं से साइकिल चलानी आ जाए तो एक दिन तुम वीनू पालीवाल भी बन सकती हो, हमको पता है कि तुम बोलो तो इंदिरा, लिखो तो अरुंधति रॉय बन सकती हो। लेकिन ये सब होने का सपना तुमको ही देखना होगा। और जो सपना देखने के बाद तुम पूरा मन बना कर चल ही पड़ो रास्ते पे तो तुम्हीं से बने इन लोगों में ताकत ही कहाँ है जो तुमको रोक सकें।

सुनो, पुरुषों को तुम्हारी जरूरत हमेशा ही रहेगी। तुम्हारी हर चीज की जरुरत होगी। तुम्हारे प्रेम की, वात्सल्य की, मुस्कुराहट की, खिलखिलाहट की, डांट की, थपकी की। तुम अजनबी ही रहो लेकिन आस-पास रहो। तुम नहीं होगी तो घर से निकला लड़का कॉलेज क्यूँ जाएगा ? तुम नहीं होगी तो काम से थका आदमी वापस घर क्यूँ जाएगा ? और सुनो ना, तुम नहीं होगी तो दुनिया खूबसूरत कौन बनाएगा ?

6 COMMENTS

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