भाजपा की पूर्वोत्तर में जीत और वामपंथ का भारत में भविष्य।

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पूर्वोत्तर के 3 राज्यों के विधानसभा चुनावों के हाल ही में आए नतीजों में भाजपा का, या यूं कहें कि नरेंद्र मोदी का विजयरथ जारी है। फिलहाल 19-20 राज्यों में भाजपा की, या उसके समर्थन की सरकार है। इसके पीछे भाजपा के कार्यकर्ताओं की अतुलनीय मेहनत एक बहुत बड़ा कारण है। भाजपा का यह कार्यकर्ता इलाहाबाद के किसी मोहल्ले में घूम रहे व्यक्ति से लेकर प्रधानमंत्री तक है, और यही शायद भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है।

लगातार ये देखा गया है कि कैसे एक चुनाव खत्म होते ही भाजपा का पूरा कैडर, तमाम केंद्रीय मंत्री, ताकतवर नेता तथा आरएसएस का भी पूरा कैडर उन राज्यों में लगा दिया जाता है जहाँ आगे चुनाव आने वाले हैं। त्रिपुरा में खुद प्रधानमंत्री ने 4 रैलियां की। नाथ सम्प्रदाय को मानने वाले लोगों की अधिकता होने के कारण नाथ सम्प्रदाय के वर्तमान मुखिया योगी आदित्यनाथ ने लगभग डेढ़ दर्जन रैलियां की। इनके अलावा भी तमाम मंत्री तथा छोटे कार्यकर्ता गुजरात चुनावों के बाद से ही वहां सक्रिय थे, जिसने भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाई। वहीं माणिक सरकार अपनी ईमानदार, लो प्रोफ़ाइल व जमीनी नेता की छवि को भुना नहीं सके।

वामपंथ का ये गढ़ दरकने के बाद जो दो सबसे आसान बातें कही जा रही है वो यह कि; पहला, वामपंथ का भारत से अंत हो गया है और दूसरा कि वामपंथी दलों को कांग्रेस से समझौता कर लेना चाहिए। ये दोनों ही बातें हास्यास्पद नजर आती हैं। वामपंथ का खात्मा होने की बातें जो कर रहे हैं उनको खुद से ही पूछना चाहिए कि जब 2 सीटें थीं भाजपा की, तब देश में दक्षिणपंथ खत्म हो गया क्या ? विचार/विचारधाराएं खत्म नहीं हुआ करतीं। प्रतिनिधि खत्म हो सकते हैं, लेकिन समूची विचारधारा नहीं।

कांग्रेस के साथ गठबंधन में भी वामपंथ का कोई खास फायदा नहीं। कांग्रेस की नाव फिलहाल खुद ही मझधार में फंसी हुई है। राहुल को हारने की ऐसी आदत लग चुकी है कि अब उनको फर्क नहीं पड़ता। परिणामों के समय वो नानी से मिलने इटली चले जाते हैं। कैसा होता कि वो मध्य प्रदेश में आकर कार्यकर्ताओं संग होली खेल लेते, राजस्थान चले जाते, जहाँ भाजपा पहले से ही कमजोर है और आगे चुनाव हैं।

वामपंथी नेताओं को फिलहाल तो यही करना होगा कि कम से कम हार को स्वीकारें, अपने वातानुकूलित कमरों से बाहर आएं, जमीन पे उतरें और सिर्फ केरल, जेएनयू और कुछ मीडिया ऑफिसेज़ में ना सिमटे रहें। बाकी भाजपा का क्या है, उनका तो ‘चप्पा-चप्पा, भाजप्पा’ चल ही रहा है।

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