चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ महाभियोग : क्या है पूरा मामला।

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कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी अपील वापस ले ली है। गौरतलब है कि परसों सुबह कांग्रेस के 2 नेताओं ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) दीपक मिश्रा के खिलाफ लाए गए महाभियोग को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू द्वारा खारिज कर देने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। ये दो नेता पंजाब से राज्यसभा सांसद प्रताप सिंह बजवा और गुजरात से राज्यसभा सांसद हर्षाद्रय याज्ञनिक थे। सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका को कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण लीड कर रहे थे, जिसकी सुनवाई जस्टिस जे. चेलमेश्वर और जस्टिस एस. के. कौल की अध्यक्षता वाली बेंच कर रही थी। गौरतलब है कि CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ जो महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था उसमें एक सिग्नेचर कपिल सिब्बल का भी था।

याचिकाकर्ता सांसदों का कहना था कि उपराष्ट्रपति जी को महाभियोग प्रस्ताव के समय सिर्फ यह देखना था कि क्या उसपर जरूरी संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर हैं या नहीं ना कि चीफ जस्टिस पर लगे आरोपों का जवाब देना था।

जस्टिस चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा इस याचिका की सुनवाई कल सुबह 10:30 बजे होनी थी लेकिन परसों शाम 7:30 बजे जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस याचिका को 5 जजों की संविधान पीठ को सौंप दिया। जिन 4 जजों ने CJI के खिलाफ 12 जनवरी को प्रेस कांफ्रेंस की थी, उनको इससे दूर रखा गया था। कोर्ट से याचिका हटा लेने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में कपिल सिब्बल ने बताया कि उनको उस आदेश की कॉपी चाहिए थी जिसने ये बेंच बनाई थी जिसको देने से उनको मना कर दिया गया।

क्या है महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया और क्यों लाया गया था ?

भारतीय संविधान के अनुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश को उनके पद से हटाने के लिए एक ही प्रक्रिया है, महाभियोग प्रस्ताव। यह प्रस्ताव संसद में लाया जा सकता है। इसको पेश करने के लिए लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर चाहिए होते हैं जिसके बाद सदन का सभापति इसको खारिज कर सकता है या स्वीकृति दे सकता है। स्वीकृति के बाद चीफ जस्टिस के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए तीन लोगों की एक कमेटी बनाई जाती है जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट का जज, देश के किसी एक राज्य के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश में से कोई एक जज और एक कोई कानून का जानकार होता है। इन लोगों को जांच कर के अपनी रिपोर्ट सदन में पेश करनी होती है जहाँ से सदन की सहमति के बाद इसको दूसरे सदन में भेज दिया जाता है। अगर संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत मिल जाता है तो इसको राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद चीफ जस्टिस को अपने पद से त्यागपत्र देना होता है।

हाल ही में जस्टिस लोया के केस में अमित शाह को दोषमुक्त करार दिए जाने के बाद कांग्रेस ने संसद में CJI मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की बात की। राज्यसभा में प्रस्ताव लाने के लिए जरूरी 50 सांसदों से ज्यादा हस्ताक्षर जमा कर कांग्रेस ने जब इसको सभापति उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के सामने लाया तो उन्होंने इसको खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि CJI मिश्रा के खिलाफ जो वजहें दी गई हैं वो कोई ठोस वजहें नहीं हैं।

हालांकि कांग्रेस ने कहा कि ये बदले की भावना से लिया गया कदम नहीं था बल्कि सुप्रीम कोर्ट में चल रही अनियमितताओं के विरोध में, कार्यपालिका व न्यायपालिका अर्थात् कोर्ट व सरकार के बीच संबंधों के विरोध में है।

किन अनियमितताओं की बात कांग्रेस कर रही है ?

12 जनवरी, 2018, भारतीय न्यायपालिका का इतिहास जब भी लिखा जाएगा उसमें ये तारीख ऐतिहासिक महत्व रखेगी। इस तारीख को पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जज चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा के खिलाफ मीडिया में आए और कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ सही नहीं चल रहा है। ये 4 जज थे, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकूर और जस्टिस कुरियन जोसेफ। वरिष्ठता के मामले में ये चारों जज सुप्रीम कोर्ट में 2 से 5 नंबर पे हैं।

जस्टिस चेलमेश्वर के घर पर हुई उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जजेस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में तमाम तरह की चीजें हो रही हैं जिनसे उसकी साख पर बट्टा लग सकता है। उन्होंने कहा था कि उन्होंने अपनी बात CJI के सामने रखी लेकिन उधर से कोई ठोस कार्यवाही या आश्वासन ना मिलने के कारण उनको अपनी बात रखने मीडिया में आना पड़ा। वो नहीं चाहते कि देश के लोग ऐसा समझें कि जजों ने अपनी आत्मा बेच दी है।

इस प्रेस कांफ्रेंस व उसके बाद मीडिया में दी गई चिट्ठी से कई चीजें सामने आईं जिनका उस समय जजेस ने और अब जिनको आधार बना कर कांग्रेस CJI का विरोध कर रही है।

उस प्रेस कांफ्रेंस में जजों ने कुछ फैसलों का जिक्र किया जिनकी वजह से उनको लगता था कि देश की न्याय व्यवस्था में रुकावटें, हाईकोर्ट की स्वतंत्रता प्रभावित होने व मुख्य न्यायाधीश के काम पर असर पड़ने जैसे काम हुए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ होते हैं। वही तय करते हैं कि कौन से केस की सुनवाई कौन सा जज या कौन सी बेंच करेगी। सुप्रीम कोर्ट के सभी जज बेंच और मामले तय करने में मुख्य न्यायाधीश के फैसले का सम्मान करते हैं। ये कोई नियम नहीं हैं। लेकिन इनको नियम की ही तरह माना जाता है ताकि सुप्रीम कोर्ट के काम पर उंगलियाँ ना उठें। इसका ये मतलब नहीं कि चीफ जस्टिस अपने साथी जजों से किसी भी तरह से श्रेष्ठ या कानूनी व संवैधानिक तौर पर ज्यादा ताकतवर हैं। वो सभी के बराबर लेकिन प्रथम हैं।

अपनी प्रेस कांफ्रेंस में जजों ने कहा कि इन प्रथाओं की अवमानना हो रही है। चीफ जस्टिस ने देश पर गहरा असर डालने वाले मुद्दों पर सुनवाई के लिए बिना किसी ठोस कारण को दिए अपनी पसंद के जजों को नियुक्त किया है। ये चीज रुकनी चाहिए वर्ना पूरा लोकतंत्र नाकाम हो जाएगा। इस प्रेस कांफ्रेंस पर खूब विवाद हुआ। चारों जजों ने एक चिट्ठी मीडिया में दी जिसमें दो केसों का जिक्र भी किया था और आखिर में हिंट दिया कि ऐसे और भी मामले हैं।

वो मामला कुछ दिनों में शांत हो गया लेकिन इसके बाद 21 मार्च, 2018 को जस्टिस जे. चेलमेश्वर ने फिर से चीफ जस्टिस के नाम एक छः पन्नों की चिट्ठी लिख कर बताया कि कार्यपालिका अर्थात् सरकार और न्यायपालिका के बीच भाईचारा स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं। इस चिट्ठी की प्रति उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के और भी 22 जजों को भेजी। उन्होंने कहा कि सरकार न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप कर रही है और इसके समाधान के लिए फुल कोर्ट बुलाई जानी चाहिए। इस खत में उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट के एक भावी जस्टिस के खिलाफ सरकार द्वारा एक ऐसा केस खुलवाए जाने को लेकर विरोध जताया जिसमें पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसला आ चुका है। जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति कॉलेजियम द्वारा होती है लेकिन सरकार जजों की नियुक्ति में हस्तक्षेप कर रही है। सरकार को जज की नियुक्ति पर आपत्ति की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के पास आपत्ति दर्ज करानी चाहिए थी, जिसके उलट सरकार ने कोर्ट को केस फाइल फिर से खोलने को कहा और कोर्ट ने बिना किसी विमर्श के केस फाइल ओपन भी कर दी। इसका मतलब है कि न्यायपालिका सरकार के प्रति ज्यादा वफादार है वरन् CJI के।

इन्हीं अनियमितताओं व शिकायतों को लेकर पहले से CJI मिश्रा के खिलाफ मोर्चा खोले जस्टिस जे. चेलमेश्वर के समर्थन में अब कांग्रेस व सभी विपक्षी दलों ने एक होकर महाभियोग प्रस्ताव लाया था जो कि खारिज कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट से भी कल अपनी याचिका वापस लेने के बाद आगे क्या करना है इसके बारे में हालांकि कांग्रेस की तरफ से मीडिया में कोई बयान नहीं आया है। लेकिन हाथ आए एक बड़े व संवेदनशील मुद्दे को कांग्रेस ऐसे ही व्यर्थ तो नहीं जाने देना चाहेगी। आगे जो भी होगा, देखना रोचक होगा। राजनीति से इतर, सुप्रीम कोर्ट में जो भी समस्याएं हैं उनका जल्द से जल्द समाधान होना चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया में तमाम खामियां होने के बावजूद भी आम आदमी अभी भी किसी अन्याय के विरोध में मदद के लिए कोर्ट की तरफ देखता है। और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे उच्च न्यायिक संस्था में कार्यपालिका का हस्तक्षेप, अगर है तो, बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

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