आज आसिफा, कल कौन ?

7

कश्मीर और उन्नाव खबरों में हैं। वजह जो है वो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। उन्नाव में जहाँ एक लड़की ने भाजपा के एक विधायक पर बलात्कार का आरोप लगाया है, वहीं कश्मीर में कठुआ नाम की जगह पर एक व्यक्ति ने 8 साल की बच्ची का बलात्कार कर दिया।

कश्मीर वाली घटना को थोड़ा डीटेल में जानिए और समझिए। एक व्यक्ति ने 8 साल की एक बच्ची को अगवा किया। मंदिर में कई दिनों तक बंदी बना कर रखा व उसके साथ बलात्कार किया। उस बच्ची को ड्रग्स व सेक्सवर्धक दवाएं दी गईं। बाद में उसने मेरठ, लगभग 500 किलोमीटर दूर, से अपने किसी दोस्त को बुलाया उस बच्ची से बलात्कार करने के लिए। उसके बाद करीब 8-9 दिनों तक बच्ची से बलात्कार करने के बाद जब उन्होंने सोचा कि अब इसकी हत्या कर देते हैं तो उनको वो पुलिसवाला मिला जो उस बच्ची के अगवा होने की जांच कर रहा था। उसने कहा कि मारने से पहले मैं भी इसके साथ बलात्कार करूँगा।

हालांकि ये साफ जाहिर है कि कश्मीर के इस मामले में वजहें धार्मिक कट्टरता है। बलात्कारी हिन्दू है और बच्ची मुस्लिम धर्म की। लेकिन उसकी बात नहीं करते हैं। बात करते हैं मानसिकता की। उस मानसिकता की, जो हमारे चुने हुए नुमाइंदों से कहलवाती है कि लड़के हैं, गलतियाँ तो हो जाती हैं, या फिर ये कि 3 बच्चों की माँ के साथ कौन बलात्कार करेगा ?

बलात्कार एक सामाजिक कोढ़ है।

कोई भी बलात्कार होते ही हम तुरंत सरकारों से सवाल करने लगते हैं। 16 दिसम्बर के निर्भया आन्दोलन ने तत्कालीन सरकार को गिराने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन ऐसा करते वक़्त हम एक समाज के तौर पर खुद की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं। आपको मानना पड़ेगा कि सरकार बलात्कारियों को पकड़ कर सजा दिला सकती है लेकिन बलात्कार होने से नहीं रोक सकती है। कैसे रोक पाएगी ? सरकार हर व्यक्ति को निजी पुलिस नहीं दे सकती है। बलात्कार के मामले घरों से भी आते हैं। चाचा, मामा, भाई, पिता, हर रिश्ते ने, जो कोई पुरुष का किसी लड़की के साथ हो सकता है, लड़कियों के साथ ऐसे कृत्य किए हैं। हाँ ये बात जरूर है कि लोगों में व्यवस्था का डर नहीं है जिससे उनका मन बढ़ा हुआ है। सरकार व्यवस्था सुधार सकती है, कड़े कानून ला सकती है जिससे लोगों में डर बने लेकिन तब भी ये पूरी तरह से रुक जाएंगे, ऐसा कहना ना तो संभव है, ना ही तर्कसंगत लगता है।

बुराई बढ़ती है क्योंकि अच्छे लोग चुप रहते हैं।

अभी कुछ दिन पहले की बात है। एक भईया हैं दिल्ली में, पेशे से पत्रकार हैं। देर रात काम से वापस आ रहे थे। मेट्रो से उतरने पे उनको दिखा कि कुछ लोग एक कपल को परेशान कर रहे थे। तमाम लोग वहाँ से गुजर रहे थे लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया इसपे या फिर यूँ कहें कि देना नहीं चाहा। देख के अनदेखा कर दिया। पत्रकार महोदय जब रोकने गए तो उन लोगों ने उनपर ब्लेड वगैरह से हमला कर दिया। कपल मौका पाकर जगह से निकल गया। बचाने की कोशिश भी नहीं की। आसपास से और लोग गुजर रहे थे लेकिन किसी ने पलक नहीं झपकाई। किसी तरह से बच कर वो वहाँ से निकल सके।

एक घटना सुनने में आई थी कि सड़क पर बलात्कार हो रहा था व लोग वीडियो बना रहे थे। ये चीजें यूँ ही नहीं होती। लोग गलत को गलत बोलने में तब तक चुप रहते हैं जब तक बात उन तक नहीं पहुंचती। बात सिर्फ एक आसिफा या एक नैनसी या एक निर्भया की नहीं है। बात है कि हमारे आसपास ही हैं ऐसे लोग। बसों में, ट्रेनों में, सड़क पर, घर में, स्कूलों में, पार्क में। इसका मतलब ये कत्तई नहीं कि हर पुरुष रेपिस्ट ही है, लेकिन ऐसे लोग हमारे बीच ही हैं। और इसलिए हैं क्योंकि हम चुप हैं। हल्का भी अंदाजा लगे तो इनका विरोध कीजिए। अपने घर में घुसने देने का वेट मत कीजिए। इनकी पहचान करना मुश्किल नहीं। बिल्कुल मुश्किल नहीं। ये लोग आपको बसों में लड़कियों से चिपकते, उनको छूते मिल जाएंगे। ये लोग आपको ‘क्या माल जा रहा है’ जैसे कमेंट करते मिल जाएंगे।

सेक्स एजुकेशन जरूरी है।

हम एक कुंठित समाज हैं। प्राचीन भारत जहाँ इन मुद्दों को लेकर जागरूक था, वर्तमान भारत उतना ही कुंठित है। मध्यकालीन समाज के झंडाबरदारों ने संस्कृति व सभ्यता के नाम पर हमको ऐसी खाल ओढ़ने को दे दी है जिसके बोझ तले हम झुकते ही चले जा रहे हैं।

सेक्स एजुकेशन, इसको लेकर जागरूकता, काउंसलिंग केंद्र जैसी चीजें हर शिक्षण संस्थान में होना चाहिए। बिना गांव या शहर का भेदभाव किए बगैर। ये एक काम है जो वास्तव में सरकार कर सकती है। कानून और कड़े किए जा सकते हैं। लोकतंत्र और मानवाधिकारों की दुहाई को परे रखकर ऐसी सजा के प्रावधान की जरूरत है जो लोगों में डर पैदा करे। सामाजिक सुधार एक दिन में नहीं होते। पीढियां खप जाती हैं। इसके सुधार में भी दशकों लगेंगे। लेकिन अगर हम 10 पीढ़ी बाद की बेटियों को भी एक सुरक्षित समाज दे पाए तो उससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता।

हालांकि ये सब कहने सुनने में जैसा लगता है, वैसा होने से रहा। सरकारें चुनावों में व्यस्त हैं, युवा लेफ्ट और राइट और हिन्दू-मुस्लिम में उलझे पड़े हैं। सरकारों से कोई सवाल पूछने से रहा। हर 5 साल बाद हम फिर से उन्हीं लोगों को अपना प्रतिनिधि बना लेते हैं। लेकिन सरकार कुछ भी कर ले, किसी की मानसिकता बदल नहीं सकती।

हमको ये मानना ही पड़ेगा कि कहीं ना कहीं दिक्कत हमारे समाज में है जब हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधि ऐसे बयान देते हैं कि 3 बच्चों की माँ से कौन रेप करेगा ? हमको ये मानना पड़ेगा कि दिक्कत हमारे समाज में है जब वकील एक बलात्कारी के पक्ष में जमा होकर पुलिस को चार्जशीट फाइल करने से रोकते हैं। दिक्कत हमारे समाज में ही है जब निर्भया केस में विपक्षी वकील बोलता है कि मेरी बेटी किसी लड़के के साथ होती तो मैं उसको खुद ही मार देता। दिक्कत हमारे बीच में है जब निर्भया का रेपिस्ट बोलता है कि उसको विरोध नहीं करना चाहिए था। हम रेप कर रहे थे तो करने देती।

दिक्कत ये है कि मैं इसको लिख कर और आप इसको पढ़ के सो जाएंगे। दिक्कत ये है कि हमको नींद आ जाती है। दिक्कत ये है कि सबको देश बदला हुआ चाहिए लेकिन बदलने को कोई नहीं तैयार है। हम कल फिर से बस में जाएंगे। कोई किसी को छुएगा। हम देखेंगे। रोकने की बजाय वीडियो बनाएंगे। दिक्कत ये है कि हम सब सोये ही हुए हैं।

7 COMMENTS

    • This article wasn’t meant to make you feel helpless. This is all about how we, the people, actually can bring the change we want to see. All of us, on our individual level, can change a little. 🙂

  1. आप जैसे किशोर के परिपक्व विचार पढ़कर दुख भी हुआ, अपने तथाकथित सभ्य समाज पर शर्म भी आई। अच्छा भी लगा कि आने वाली पीढ़ी स्पष्ट एवं सुसस्ंकृत विचारधारा रखती है । अफ़सोस यह कि समाज को सुरक्षा प्रदान करने वाले व दिशा देने वाले ऐसी सोच क्यों नहीं रखते ??????

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here